पंचतंत्र मे कारक का प्रयोग

पंचतंत्र :  कारक का प्रयोग

                             डॉ स्नेहलता व्यास 

 सहायक आचार्य 

 राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर

 श्री महालक्ष्मी गर्ल्स कॉलेज, प्रताप नगर जोधपुर 


1. प्रस्तावना    

पंचतंत्र विश्व-विख्यात नीति-ग्रंथ है, जिसका रचनाकार पंडित विष्णु शर्मा को माना जाता है। राजा अमरशक्ति के तीन अयोग्य पुत्रों को अल्पकाल में नीति-ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से विष्णु शर्मा ने पाँच तंत्रों में कथाओं का संग्रह तैयार किया, जिसे पंचतंत्र कहा गया।

पंचतंत्र की कथाएँ मनोरंजक होने के साथ-साथ नीति, धर्म, व्यवहार-ज्ञान, राजनीति, मैत्री, शत्रुता और चतुराई का व्यावहारिक ज्ञान भी देती हैं। भाषाशैली सरल, प्रवाहपूर्ण और कथारसपूर्ण है।

2. परिष्कृत कारक (Pariṣkṛta Kāra)

संस्कृत व्याकरण में ‘कारक’ उन संबंधों को कहते हैं जो क्रिया और कर्ता/कर्म आदि के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हैं।

पंचतंत्र में प्रयुक्त भाषा को परिष्कृत (शुद्ध, सुव्यवस्थित, व्याकरणसम्मत) माना जाता है; इसलिए यहाँ ‘परिष्कृत कारक’ से आशय है—

 पंचतंत्र में कारक-प्रयोग की शुद्धता, सौष्ठव, और व्याकरणिक निपुणता का विश्लेषण।

नीचे पंचतंत्र की भाषा में प्रमुख कारकों के प्रयोग और उनके उदाहरण दिए गए हैं।

3. पंचतंत्र में कारकों का विस्तृत वर्णन

(1) कर्ता-कारक (Nominative Case — कर्ता)

कर्ता वह है जो क्रिया को करता है।

पंचतंत्र में सामान्यतः प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।

उदाहरण :

सिंहो वनं गच्छति। (सिंह जंगल जाता है।)

मूषकः बिलं प्रविशति।

कर्तृवाचक शब्दों में स्पष्टता, सरलता और वाक्यों की प्रवाहपूर्ण रचना ― यही पंचतंत्र की विशेषता है।

(2) कर्म-कारक (Accusative Case — कर्म)

कर्म वह है जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है। द्वितीया विभक्ति प्रयोग।

उदाहरण :

काकः मांसं गृह्णाति। (कौआ मांस लेता है।)

व्याघ्रः हरिणं धावति।

ज्ञानवर्धक कथाओं में वस्तुओं, प्राणियों, और लक्ष्य को स्पष्ट करने हेतु कर्म का सुश्रृंखल प्रयोग मिलता है — इसलिए इसे परिष्कृत कहा जाता है।

(3) करण-कारक (Instrumental Case — करण)

क्रिया करने के साधन को करण कहते हैं। तृतीया विभक्ति।

उदाहरण :

शृगालः बुद्ध्या जीवति। (सियार बुद्धि से जीता है।)

वानरः हस्तेन फलं गृह्णाति।

पंचतंत्र की नीति-प्रधान शैली में ‘बुद्ध्या’, ‘चातुर्येण’, ‘धर्मेण’ जैसे करण-प्रयोग अत्यंत सामान्य व परिष्कृत हैं।

(4) संप्रदान-कारक (Dative Case — प्राप्तकर्ता)

जिसके लिए कोई कार्य किया जाए, वह संप्रदान कहलाता है। चतुर्थी विभक्ति।

उदाहरण :

ब्राह्मणः देवाय नमति।

राजा प्रजाय अर्थं नियमं करोति।

पंचतंत्र में यह कारक उद्देश्य, हित, लाभ तथा उपदेश दर्शाने में उपयोगी है।

(5) अपादान-कारक (Ablative Case — स्रोत/वियोग)

किसी स्थान, वस्तु, या व्यक्ति से अलग होना। पंचमी विभक्ति।

उदाहरण :

काकः वृक्षात् पतितं फलं गृह्णाति।

शृगालः भयात् पलायते।

कहानी के प्रसंगों में ‘स्थान से गमन’, ‘भय से हटना’ आदि हेतु इसका परिष्कृत उपयोग मिलता है।

(6) अधिकरण-कारक (Locative Case — स्थान/समय)

किस स्थान में, किस समय में कार्य हो रहा है — सप्तमी विभक्ति।

उदाहरण :

वनमध्ये सिंहः वसति।

गृहं मध्ये बिलः अस्ति।

अधिकरण-प्रयोग पंचतंत्र के वर्णनात्मक शैली को और जीवंत बनाता है।

4. पंचतंत्र में कारक-प्रयोग की विशेषताएँ (परिष्कृतता के आधार)

(1) भाषा सरल, पर व्याकरण-सम्मत है

प्रत्येक कारक का प्रयोग औचित्य के साथ है।

अर्थ अस्पष्ट नहीं होता।

(2) कथ्य और व्यंग्य दोनों में सही विभक्ति-प्रयोग

पंचतंत्र की कथाओं में नैतिक उपदेश व संवाद दोनों में कारक-प्रयोग अत्यंत सटीक है।

(3) प्राणी-व्यवहार को दर्शाने में कारकों का प्रयोग सरलता देता है

जैसे—कर्म, करण, अधिकरण आदि से कथाएँ जीवंत बनती हैं।

(4) नीति-सूत्रों में कारकों का अत्यंत परिष्कृत उपयोग

उदाहरण :

मित्रं बलं न च धनं बलम्।

धर्मेण जीवेत्।

इनमें कारकों की शुद्धता संदेश को और प्रभावी बनाती है।


5. निष्कर्ष

पंचतंत्र में प्रयुक्त भाषा परिष्कृत, सरल, सरस और नीति-प्रधान है।

कारक-प्रयोग न केवल शुद्ध है बल्कि कथाओं को सहज और प्रभावशाली बनाता है।

इसी परिष्कृत भाषा-शैली के कारण पंचतंत्र आज भी संस्कृत साहित्य का अमूल्य रत्न माना जाता है।


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