संदेश

नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संस्कृत व्याकरण : कारक

  संस्कृत व्याकरण - कारक  डॉ स्नेहलता व्यास   सहायक आचार्य   राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर  श्री महालक्ष्मी गर्ल्स कॉलेज, प्रताप नगर जोधपुर   पाणिनीय परंपरा के अनुसार कारकों (kāraka) की समग्र और परीक्षा-उपयोगी व्याख्या   पाणिनि ने कारक-सिद्धांत को अष्टाध्यायी में व्यवस्थित किया है और पारम्परिक व्याकरण में छः (ṣaṭ) कारक मान्य माने गए हैं।  तालिका (छः मुख्य कारक) कारक (संस्कृत) अर्थ / भूमिका सामान्यतः प्रयुक्त विभक्ति (case) सरल उदाहरण (संस्कृत) अर्थ (हिन्दी) कर्तृ (kartā) क्रिया का कर्ता — जो कार्य करता/कराता है प्रथमा (Nom.) — परंतु कुछ प्रसंगों में तृतीया भी सिंहो पीलं खादति। सिंह पीला (कौन) खाता है → सिंह खाता है। कर्म (karman) क्रिया का कर्म/वस्तु — जिस पर क्रिया होती है द्वितिया (Acc.) सिंहो मांसं खादति। सिंह मांस खाता है। करण (karaṇa) साधन/उपकरण/माध्यम — जिससे क्रिया होती है तृतीया (Instr.) काकः हस्ते फलं गृह्णाति। कौआ हाथ से फल लेता है (हाथ-से = साधन)। सम्प्रदान (sampradāna) प्राप्...

पंचतंत्र मे कारक का प्रयोग

पंचतंत्र :  कारक का प्रयोग                              डॉ स्नेहलता व्यास    सहायक आचार्य   राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर  श्री महालक्ष्मी गर्ल्स कॉलेज, प्रताप नगर जोधपुर  1. प्रस्तावना     पंचतंत्र विश्व-विख्यात नीति-ग्रंथ है, जिसका रचनाकार पंडित विष्णु शर्मा को माना जाता है। राजा अमरशक्ति के तीन अयोग्य पुत्रों को अल्पकाल में नीति-ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से विष्णु शर्मा ने पाँच तंत्रों में कथाओं का संग्रह तैयार किया, जिसे पंचतंत्र कहा गया। पंचतंत्र की कथाएँ मनोरंजक होने के साथ-साथ नीति, धर्म, व्यवहार-ज्ञान, राजनीति, मैत्री, शत्रुता और चतुराई का व्यावहारिक ज्ञान भी देती हैं। भाषाशैली सरल, प्रवाहपूर्ण और कथारसपूर्ण है। 2. परिष्कृत कारक (Pariṣkṛta Kāra) संस्कृत व्याकरण में ‘कारक’ उन संबंधों को कहते हैं जो क्रिया और कर्ता/कर्म आदि के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हैं। पंचतंत्र में प्रयुक्त भाषा को परिष्कृत (शुद्ध, सुव्यवस्थित, व्याकरणसम्मत) माना जाता है; इसलिए ...

“रघुवंशम् महाकाव्य” परिचय

रघुवंशम् महाकाव्य : परिचय  Detailed Introduction डॉ स्नेहलता व्यास    सहायक आचार्य   राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर  श्री महालक्ष्मी गर्ल्स कॉलेज, प्रताप नगर जोधपुर  1. काव्य का नाम और अर्थ “रघुवंशम्” संस्कृत का एक महान महाकाव्य है, जिसका अर्थ है— "रघु के वंश का वर्णन करने वाला काव्य"। यह काव्य सूर्यवंश के महान सम्राट राजा रघु और उनके वंशजों के जीवन, गौरव, राज्य-नीति, आदर्शों तथा पराक्रम का काव्यात्मक वर्णन करता है। 2. रचनाकार का परिचय – कालिदास रघुवंशम् के रचनाकार महाकवि कालिदास हैं। कालिदास संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठतम कवि माने जाते हैं। उनका समय लगभग 4th–5th century CE माना जाता है। वे सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। उन्हें “काव्य-सम्राट”, “उपन्यास काला के चन्द्रमा”, “उपमा कालिदासस्य” जैसे उपाधियों से विभूषित किया गया है। कालिदास की रचनाएँ प्राकृतिक सौंदर्य, मानवीय भावनाओं, अलंकारों और रसों से परिपूर्ण हैं। 3. रघुवंशम् की रचना–प्रकृति यह एक महाकाव्य है, जिसकी संरचना संस्कृत महाकाव्य परंपरा के अनुसार की गई है। महाकाव्य की विशेषताएँ:...

कुमारसंभवम्

  कुमारसंभवम्   डॉ स्नेहलता व्यास    सहायक आचार्य   राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर  श्री महालक्ष्मी गर्ल्स कॉलेज, प्रताप नगर जोधपुर ‘ कुमारसंभव’ संस्कृत के महान कवि महाकवि कालिदास द्वारा रचित एक महाकाव्य है। यह शिव और पार्वती के विवाह तथा उनके पुत्र कुमार (कार्तिकेय) के जन्म की कथा पर आधारित है। सारांश  कुमारसंभवम् का अर्थ है — “कुमार (कार्तिकेय) का जन्म”। इस महाकाव्य में कुल अष्ट (8) सर्ग हैं। इसमें हिमालय की पुत्री पार्वती और भगवान शिव के विवाह की कथा का अत्यंत सुंदर, काव्यमय वर्णन है। मुख्य घटनाएँ: 1. हिमालय और मेना की कन्या पार्वती का वर्णन किया गया है। पार्वती बचपन से ही तपस्विनी थीं और उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया। 2. भगवान शिव सती के देहांत के बाद विरक्त होकर तपस्या में लीन थे। 3. देवता, जो तारकासुर नामक असुर से भयभीत थे, ब्रह्मा की आज्ञा से पार्वती और शिव के मिलन की योजना बनाते हैं, क्योंकि उनके पुत्र से ही तारकासुर का वध होना था। 4. कामदेव शिव को तपस्या से विचलित करने के लिए आता है, परंतु शिव उसकी ओर से क्रुद्...